श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] शादी, जन्मदिन, नये घर का मुहूर्त, दुकान का शुभारंभ; खुशी का कैसा भी आयोजन हो, शगुन के रूप मेँ लिफाफा देने का चलन बढ़ रहा है। किसी जमाने मेँ शगुन लड़की की शादी मेँ दिया/लिया जाता था। माँ बताया करती थी कि ये उस जमाने की बात है, जब साधन कम होते थे। दिखावा बिलकुल भी नहीं था। रिश्तों मेँ अपनत्व के साथ-साथ सहयोग की भावना थी। लेन-देन मेँ दिखावे और बदले की बजाये सहयोग की भावना होती थी। लड़की की शादी मेँ बान इसलिये दिया जाता था कि बेटी के पिता पर आर्थिक बोझ ना पड़े। उसे बहुत अधिक कर्ज ना लेना पड़े। इसलिये रिश्तेदार से लेकर आमंत्रित आस-पास पड़ोसी, परिचित बान के रूप मेँ नकदी देते थे।
कुछ व्यक्ति आपस मेँ मिलकर कोई उपहार भी दे देते, जो लड़की को दिया जाता था। ये वो वक्त था जब मेहमान लड़की की शादी के घर मेँ खाना नहीं खाया करते थे। शादी का पूरा काम करते, किन्तु खाना नहीं खाते थे। वेटर का कहीं नाम निशान ही नहीं था। बारात की खातिरदारी पड़ोसियों और लड़की के भाइयों के दोस्तों के जिम्मे हुआ करती थी। ये वो दौर था जब बारात आया करती थी। धर्मशाला मेँ उसे ठहराया जाता था। जहां अनेक व्यक्तियों की ड्यूटी बरातियों की आवभगत के लिये लगाई जाती थी। ड्यूटी मेँ ऐसे व्यक्ति होते थे; जिनका स्वभाव विनम्र होता था। जिनको किसी भी बाराती को नाराज ना करने की विशेष हिदायत होती थी।
धर्मशाला मेँ ठहरी बारात बेटी के घर के सामने लगे टेंट मेँ खाना खाने आती थी। आती क्या थी, बाकायदा बरातियों को मनुहार करके लाया जाता था। उनके स्वागत के लिये लकड़ी के विभिन्न रंगों के बुरादे से रंगोली सजाई जाती थी। दूल्हे, दूल्हे के बहनोई और दोस्तों के भोजन के वास्ते खास इंतजाम के साथ-साथ उनको भोजन करवाने के लिये खास व्यक्तियों की ड्यूटी लगाई जाती थी। ऐसे व्यक्ति पूरे जी जान से ये काम करते थे। बरातियों को धर्मशाला मेँ रात को गरम दूध दिया जाता था।
ताश खेलने वाले बरातियों के लिए ताश उनकी तीमारदारी मेँ लगे लड़की वालों की जेब मेँ हुआ करती थी। लगभग प्रतेयक बारात मेँ एक-दो व्यक्ति ऐसे हुआ ही करते थे, जो बाराती होने का नाजायज लाभ उठाने से बाज नहीं आते थे। ऐसे व्यक्ति, ले लाओ! वो इंतजाम करो! चाय ठंडी है! दूध बहुत गरम है…जैसे नखरों से मेजबान को परेशान करते थे।
एक बार रात को ढुकाव का समय हो गया। बारात धर्मशाला से लड़की के दरवाजे तक आने वाली थी कि तेज बारिश आ गई। सब इंतजाम अस्त व्यस्त। टेंट मेँ भोजन संभव नहीं था। तुरंत पड़ोसियों के घरों मेँ मेज कुर्सियों लगा कर बरातियों के भोजन का प्रबंध किया गया। जिनके घर सोफ़े थे; वहाँ दूल्हे को भोजन करवाया गया। पड़ोसियों ने इसे अपना सौभाग्य समझा। विदाई तक पड़ोसियों के घरों मेँ चहल-पहल होती रही। आज ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। वो कितना अपनत्व से सराबोर वक्त था जब शादी-विवाह मेँ आने वाले परिवार, रिश्तेदारों के लिये पड़ोसियों के कमरे स्वतः ही खुल जाते थे। पड़ोसी शादी वाले घर खुद बोल के जाते कि कमरा तैयार कर दिया, कौन ठहरेगा, बता देना। पड़ोसी उसी के हिसाब से कमरे मेँ ठहराये जाने वाले मेहमान के लिये जरूरी इंतजाम करते। ऐसे इंतज़ामों को कोई किसी अहसान नहीं।
सभी काम ज़िम्मेदारी से होते थे। आज की पीढ़ी तो ये सब बातें जानती ही नहीं। जाने भी कैसे; अब तो मैरिज पैलेस, होटल गये; लिफाफा दिया; खाना खाया और लौट आये। आज किसी को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि बारात आई या नहीं। बारात ने खाना खाया या नहीं। आमंत्रित व्यक्ति खाना खाते हैं और चले आते हैं। बारात क्या होती थी, ये भी कहाँ पता है, आज के बच्चों को। बाराती की क्या हैसियत हुआ करती थी, आज की पीढ़ी क्या जाने! बारात बनने का चाव की अनुभूति का वर्णन तो वही कर सकता है, जो कभी बाराती बना हो। अब शादियाँ तो हैं; लेकिन शहरों मेँ बारात है कहाँ! बारात के बारे मेँ फिर कभी । [समाप्त]
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