दादी ने पोती को बताया सच!

दादी! ओ दादी! 15 वर्षीय पिंकी ने दादी को आवाज दी। पिंकी दादी के कमरे मेँ ही होम वर्क कर रही थी। होम वर्क करते-करते जैसे उसे कुछ याद आया और फिर वह मीठे स्वर मेँ दादी की ओर संबोधित हुई। दादी सावित्री रामचरित मानस पढ़ रही थी। सावित्री ने मानस को माथे पर लगा साइड मेँ रखा और बोली, हाँ, पिंकी! बोल क्या बात है। ओह! दादी! मैंने आपको डिस्टर्ब कर दिया; सॉरी!
अरे नहीं रे! भगवान भी कहते हैं कि बच्चों की मुस्कुराहट मेँ भी मैं ही हूँ, दादी ने उसे अपने निकट बैठाते हुये नया दर्शन दिया। ये सुन पिंकी के चेहरे की मुस्कान और आत्मीय हो गई। दादी! मुझे आपसे एक सवाल पूछना है, आप ही के बारे मेँ; आप बुरा तो नहीं मान जाओगे ना! पिंकी बेटा, अगर बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी से सवाल नहीं करेंगे तो फिर किस से करेंगे। पूछ जो पूछना है, सावित्री ने लाड भरे शब्दों मेँ कहा।
पिंकी कहने लगी, दादी! सब कहते हैं कि आप ने परिवार का खूब ख्याल रखा। पापा, चाचा और बुआ को अपने पैरों पर खड़ा किया। किन्तु इसके बावजूद आपने दादा को अपनी किडनी नहीं दी और उनको मर जाने दिया। सावित्री के चेहरे पर सहज सुलभ लाड के स्थान पर गंभीरता आ गई। उसे पिंकी से ऐसे प्रश्न की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी। सावित्री की आँखें गीली हो गई। उसने पिंकी का हाथ अपने हाथ मेँ लिया और कहीं खो गई।
पिंकी अपनी दादी के चेहरे की ओर देखने लगी। उसने सोचा कि दादी को बेकार मेँ दुखी किया। पिंकी कुछ और सोचती इससे पहले ही सावित्री ने स्नेह से पिंकी को गले लगाया और बोली, जो किसी को नहीं पता, आज तुझे बताती हूँ। क्योंकि अनुभव पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ने चाहिये। कई बार कड़वे सच के पीछे मीठा सच भी छिपा रहता है। पिंकी ने फिर दादी का चेहरा देखा तो उस पर दृढ़ता नजर आई। आँखों मेँ नमी थी, किन्तु आँसू नहीं।
सावित्री बताने लगी, जब तेरे दादा दोनों किडनी खराब होने के कारण मरणासन्न अवस्था मेँ थे; तब मैंने एक किडनी देने की बात डाक्टर के सामने रखी। किडनी मैच भी हो गई थी। किन्तु डाक्टर ने मुझे जब ये बताया कि तेरे दादा का अंदरूनी शरीर किडनी को स्वीकार करने की स्थिति मेँ नहीं है। इसलिए नई किडनी लगाने के बावजूद तेरे दादा को कुछ दिन तक ही जिंदा तो रखा जा सकता था, इससे अधिक कुछ नहीं।
फिर दादी, पिंकी ने पूछा। पिंकी! । तेरे दादा की बीमारी के कारण कारोबार कमजोर हो रहा था। तेरे दादा की मृत्यु की अवस्था मेँ भी मैं दूसरी शादी करने की स्थिति मेँ नहीं थी। क्योंकि उस वक्त तेरे पापा कॉलेज मेँ थे। चाचा और बुआ कॉलेज जाने वाले थे। ऐसी अवस्था मेँ दूसरी शादी करती तो फिर बच्चों का क्या होता। मैंने किडनी ना देने का निश्चय किया। सावित्री एक क्षण के लिये रुकी, जैसे कुछ सोच रही हो।
इसी दौरान पिंकी ने सावित्री के मुंह के हाथ लगाकर पूछा, फिर दादी! फिर क्या तेरे दादा नहीं रहे। मैंने कारोबार संभाल लिया। तेरे पापा कॉलेज के बाद कारोबार मेँ मदद करने लगे। तेरे चाचा-बुआ की पढ़ाई जारी रही। तेरे पापा की मदद से मैंने कारोबार को बढ़ाया। तेरे पापा के सहयोग से तेरे चाचा, बुआ को पढ़ा कर उनको सैट किया। आज सभी अपने अपने परिवारों मेँ खुश हैं। अगर तब मैं किडनी दे देती तो तेरे दादा के प्राण तो बचने ही नहीं थे, मैं भी मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाती। तब शायद सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ समाप्त हो जाता।
दादी के मुंह से एक नया सच सुन कर पिंकी का दादी के प्रति सम्मान और बढ़ गया। पिंकी ने दादी को आलिंगन मेँ लिया और बोली, दादी! मेरी प्यारी दादी! आपने जो क्या वो विरले ही कर पाते हैं। सावित्री ने धीरे से पिंकी को कहा, जा अब तू यहाँ से। मैं थक गई हूँ। आराम करना चाहती हूँ। पिंकी हैरान हुई। दादी के चेहरे की ओर देखा। किन्तु दादी कहाँ देख रही थी, उसे समझ नहीं आया। उसने माँ को आवाज दी।
पिंकी की माँ ने अपनी सास की स्थिति देख सावित्री का सिर अपनी गोद मेँ ले लिया और पिंकी को पापा, चाचा को फोन करने को कहा। जब तब सब आते सावित्री पूर्ण विश्राम की अवस्था मेँ पहुँच चुकी थी। पिंकी ने जो कुछ हुआ वो बता दिया। सभी यही कहने लगे तो क्या माँ केवल कड़वे सच के पीछे छिपा मीठा सच बताने के लिए ही हमारे साथ थीं। [समाप्त] [लेखक-गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर]
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